Doctor Patient Hospital Sex
मेरा नाम वैशाली है। मैं 25 साल की खूबसूरत लड़की हूँ। बड़ी-बड़ी छातियाँ और पतली कमर किसी को भी पागल कर देने के लिए काफी हैं। मैंने एमबीबीएस किया है। मेरी पोस्टिंग असम के एक छोटे से कस्बे के गवर्नमेंट हॉस्पिटल में हुई है। मैं पिछले साल बाहर से यहाँ के ऑर्थोपेडिक वार्ड में काम कर रही हूँ। Doctor Patient Hospital Sex
शुरू से ही मुझ पर मरने वालों की कोई कमी नहीं रही है। कॉलेज के दिनों में भी मेरे पीछे काफी लड़के पड़े थे। यहाँ हॉस्पिटल के कई डॉक्टर भी मुझ पर मरते हैं। मगर मेरी चॉइस कुछ अलग किस्म की है। मैं उन परिंदों पर अपना रस न्योछावर करने में विश्वास नहीं करती जिनका काम ही फूलों का रस पीकर उड़ जाना होता है।
मेरी पसंद का आज तक कोई भी लड़का नहीं मिला। पता नहीं क्यों मुझे कोई भी पसंद ही नहीं आता। मेरे घर वाले भी मुझसे परेशान थे। कई लड़कों की तस्वीरें भी भेज चुके थे। मगर मैंने ना कर दिया था। एक बार एक डॉक्टर ने अंधेरी जगह पर मुझे पकड़कर जबरदस्ती करने लगा।
मेरी छातियों को कसकर मसलने लगा। मैं उसे धक्का मारकर उसकी गिरफ्त से निकल गई। उसके बाद तो उसकी वो थुकाई की कि मेरी तरफ देखना भी छोड़ दिया। मगर इतनी मगरूर लड़की आखिर किसके प्रेम में पड़ गई। और उस पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।
हुआ यूँ कि एक दिन मैं राउंड पर निकली थी। शाम के ६ बजे हो रहे थे। मेरे साथ एक नर्स भी थी। एक-एक पेशेंट के पास जाकर हम चेकअप कर रहे थे। एक बड़ा हॉल था, कोने की तरफ हल्का अंधेरा था। चेक करते-करते मैं जब कोने की तरफ बढ़ी तो अचानक किसी काम से नर्स वापस लौट गई। मैं अकेली ही थी। आखिरी पेशेंट था। उसके पैर में डिस्लोकेशन था।
मैं उसके पास पहुँचकर मुआयना करने लगी। चार्ट देखते हुए मैंने उसकी तरफ देखा। वो 30-32 साल का तंदुरुस्त नौजवान था। वो बिस्तर पर पीठ के बल लेटा हुआ था। चादर को सीने तक ओढ़ रखा था। उसकी रिपोर्ट देखते-देखते मेरी नजर उसकी कमर पर पड़ी। उसकी कमर के पास चादर टेंट की तरह उठा हुआ था। और उसके हाथ अपने लिंग पर चल रहे थे।
मैं कुछ पल तक एकटक उसके लिंग के इम्प्रेशन को देखती रही। वो मेरी ओर देखता हुआ अपने लिंग पर हाथ चला रहा था। मैं एकदम घबरा गई और भागती हुई कमरे से निकल गई। मेरा बदन पसीने से भीग गया था। मैं वहीं पास के क्वार्टर में रहती थी। सीधे घर जाकर ठंडे पानी से नहाया।
पता नहीं क्यों मन में एक गुदगुदी सी होने लगी थी। बार-बार मन वहीं पर खिंचकर ले जाता। किसी तरह मैंने अपने जज्बातों पर अंकुश लगाया। लेकिन जैसे-जैसे रात बढ़ती गई मेरा अपने ऊपर से कंट्रोल हटता गया। आखिर मैं तड़पकर वापस हॉस्पिटल की ओर बढ़ चली।
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उस समय रात के 10:30 हो रहे थे। चहल-पहल काफी कम हो गई थी। मैं स्टाफ की नजरों से बचती हुई ऑर्थोपेडिक वार्ड में घुसी। ज्यादातर पेशेंट सो गए थे। मैं इधर-उधर देखती हुई आखिरी बेड पर पहुँची और मेडिकल कार्ड देखने लगी। नाम लिखा था गौरव। मैंने उसकी तरफ देखा।
वो वापस उसी कंडीशन में था। लिंग खड़ा था और वो उस पर अपना हाथ चला रहा था। मैं धीरे-धीरे सरकती हुई उसके पास पहुँची। अचानक चादर के नीचे से उसका एक हाथ निकला और मेरी कलाई को सख्ती से पकड़ लिया। मैंने हाथ छुड़ाने की कोशिश की मगर उसका हाथ तो लोहे की तरह मेरी कलाई को जकड़ा हुआ था।
मैंने आस-पास नजर डाला। सब या तो सो रहे थे या सोने की कोशिश कर रहे थे। किसी को भी खबर नहीं थी कि कमरे के एक कोने में क्या ज़ोर-मशक्कत हो रही थी। उसने मेरे हाथ को चादर के अंदर खींच लिया। मेरा हाथ उसके तने हुए लिंग से टकराया। पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
वो जबरदस्ती मेरे हाथ को अपने लिंग पर रख दिया। मैंने हिचकते हुए उसके लंड को अपनी मुट्ठी में ले लिया। अब वो मेरे हाथ को ऊपर-नीचे चलाने लगा। मुझे लग रहा था मानो मैंने अपनी मुट्ठी में कोई गरम लोहा पकड़ रखा हो। उसका लिंग काफी मोटा था। लंबाई में कम से कम 10 इंच होगा।
मैं उसके लिंग पर हाथ चलाने लगी। उसने धीरे-धीरे मेरे हाथ को छोड़ दिया। मगर मैं उसी तरह उसके लिंग को मुट्ठी में सख्ती से पकड़कर ऊपर-नीचे हाथ चला रही थी। कुछ देर बाद उसका शरीर तन गया और मेरे हाथों पर ढेर सारा चिपचिपा वीर्य उड़ेल दिया। मैंने उसका लंड छोड़ दिया।
चादर से अपना हाथ बाहर निकाला। पूरा हाथ गाढ़े सफेद रंग के वीर्य से सना हुआ था। उसने मेरा हाथ पकड़कर अपनी चादर से पोंछ दिया। मैं हाथ छुड़ाकर भाग गई। घर पहुँचकर ही साँस ली। मेरे जाँघों के बीच पैंटी भीग गई थी। मैंने अपने हाथ को नाक के पास ले जाकर सूँघा।
उसकी गंध अभी तक हाथों में बसी हुई थी। मैंने एक उँगली अपने जीभ से छुआई। उसके वीर्य का टेस्ट अच्छा लगा। फिर तो सारी उँगलियाँ ही चाट गई। रात भर मैं करवटें बदलती रही। जब भी झपकी आई उसका चेहरा सामने आ जाता था। सपनों में वो मेरे तन को मसलता रहा।
रात भर बिना कुछ किए ही मैं कई बार गीली हो गई। पता नहीं उसमें ऐसा क्या था जो मेरा मन बेकाबू हो गया। जिसे जीतने के लिए अच्छे लोग अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार थे, वो खुद आज पागल हो गई थी। जैसे-तैसे सुबह हुई। मेरी आँखें नींद से और खुमारी से भरी हो रही थीं।
मैं तैयार होकर हॉस्पिटल गई। राउंड पर निकली तो मैं उसके बेड तक नहीं जा पाई। मैंने स्टाफ को बुलाकर उसके बारे में पूछा तो पता लगा कि वो गरीब इंसान है। और शायद उसके घर में कोई नहीं है क्योंकि उससे मिलने कभी कोई नहीं आता। मैंने उसको डीलक्स वार्ड में शिफ्ट करने के ऑर्डर दिए।
वार्ड का खर्चा अपनी जेब से भर दिया। साब के सामने उसके पास जाने में मुझे हिचक हो रही थी। मैं तबीयत खराब होने का बहाना करके घर चली गई। शाम को हॉस्पिटल जाकर पता लगा कि उसे डीलक्स वार्ड में शिफ्ट कर दिया है। मैं लोगों की नजर बचाकर शाम 8 बजे के आस-पास उसके वार्ड में पहुँची। वहाँ मौजूद नर्स को मैंने बाहर भेज दिया।
“तुम खाना खाकर आओ, तब तक मैं यहीं हूँ।” वो खुशी-खुशी चली गई।
मुझे देखकर गौरव मुस्कुरा दिया। मैं भी मुस्कुराते हुए उसके पास पहुँची।
“कैसे हो?” मैंने पूछा।
“तुम्हें देख लिया बस तबीयत अच्छी हो गई।”
मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा। मैं जान-बूझकर उसके सीने से लग गई। उसने मेरे होंठों को अपने होंठों से छुआ। मेरा पूरा बदन थर-थरा रहा था। मैंने भी अपने होंठ उसके होंठ से सटा दिए और उसके होंठों को अपने होंठों में दबाकर चूसने लगी।
उसके हाथ मेरी छातियों पर आ गए। ऐसा लगा जैसे इन्हीं हाथों का मुझे अब तक इंतज़ार था। मैंने उसके हाथों पर अपने हाथ रखकर अपनी छातियों को दबा दिया। वो मेरी छातियों को दबाने लगा। मेरे हाथ चादर के अंदर उसके पैंट की ज़िप से उलझे हुए थे। मैंने ज़िप खोलकर हाथ को अंदर डाल दिया।
उसका लिंग मेरे हाथ की छुअन से फुनफुकार उठा। मैं उसे बाहर निकालकर सहलाने लगी। फिर हाथों से सहला-सहलाकर उसका निकाल दिया। मेरे हाथ फिर गीले हो गए। वो मेरी छातियों से खेल रहा था। मैं हाथ बाहर निकालकर उसके सामने ही अपनी जीभ से चाटने लगी। हाथ में लगे उसके सारे वीर्य को अपनी जीभ से चाटकर साफ कर दिया। “Doctor Patient Hospital Sex”
आधा घंटा हो चुका था। मैंने जल्दी से अपने कपड़े सही किए। नर्स के आते ही मैं वहाँ से घर भाग आई। अगले दिन नर्स को खाने पर भेजकर मैंने कुंडी बंद कर ली। जैसे ही मैं गौरव के पास आई उसने मेरे चेहरे को चूम-चूमकर लाल कर दिया। मैं उसका लिंग निकाल चुकी थी।
इस बार उसने मेरे सिर को पकड़कर अपने लिंग पर झुका दिया। मैंने शरारत से होंठ भींच लिए। वो लिंग को मेरी होंठों पर रगड़ने लगा। होंठ उसके वीर्य से गीले हो गए। मैंने अपने होंठ खोलकर उसका लिंग अपने मुँह में ले लिया। पहले धीरे-धीरे और बाद में ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगी।
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काफी देर तक मुंह मैथुन करके वो मेरे सिर को पकड़कर अपने लंड पर दबा दिया। उसका लंड मेरे मुँह से होता हुआ मेरे गले के अंदर प्रवेश कर गया। उसका लिंग फूलने लगा था। मैं साँस लेने के लिए छटपटा रही थी। तभी ऐसा लगा जैसे उसके लिंग से गरम-गरम लावा निकलकर मेरे गले से होता हुआ मेरे पेट में प्रवेश कर रहा है।
मैंने सिर को थोड़ा बाहर की ओर खींचा। पूरा मुँह उसके वीर्य से भर गया था। होंठों के कोनों से वीर्य बाहर चू रहा था। मैंने प्यार से उसकी ओर देखते हुए सारा वीर्य अंदर गटक लिया। काफी टाइम हो चुका था। मैं दौड़कर बाथरूम में जाकर अपना मुँह धोई। बाल और कपड़े सही करके लौटी।
“मुझे तो लगता है तुम मार ही दोगे।” कहकर मैं उससे लिपटकर उसके होंठों को चूम ली।
थोड़ी देर में नर्स आ गई थी। इसी तरह रोज जब भी मौका मिलता मैं लोगों की नजरों से बचकर अपने महबूब से मिलती रही। हम एक दूसरे को चूमते, सहलाते थे। वो मेरी चुचियों को मसलता था, मेरी निप्पल्स से खेलता था। मैं रोज मुंह मैथुन से उसका निकाल देती थी। उसका वीर्य मुझे बहुत अच्छा लगता था। “Doctor Patient Hospital Sex”
उससे ज्यादा हम वहाँ कुछ कर नहीं पाते थे। पकड़े जाने और बदनामी का डर था। हफ्ते भर बाद एक दिन मैं वहाँ पहुँची तो कमरा खाली पाया। पूछने पर पता लगा कि उसको डिस्चार्ज कर दिया गया है। मैं कमरे में उसकी हिस्ट्री शीट में सब जगह उसका पता जानने की कोशिश की मगर कुछ पता नहीं लगा। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
मेरी हालत बावड़ियों जैसी हो गई थी। जिसे मन लगाया वो ही मेरी बेवकूफी के कारण मुझसे दूर हो गया था। मैंने उसे हर जगह ढूँढा। मगर वो तो ऐसे गायब हुआ जैसे सुबह धुंध गायब हो जाती है। मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी लड़के के लिए रोया। मेरी सहेली अंकिता जो मेरे साथ क्वार्टर शेयर करती थी, उसने भी काफी खोदने की कोशिश की मगर मैंने किसी को भी कुछ नहीं बताया।
मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी से प्यार किया था। वो गरीब था लेकिन उसमें कुछ बात थी जो उसे सबसे अलग करती थी। कुछ हो न हो मैं तो उससे प्यार करने लगी थी। घर वाले परेशान कर रहे थे शादी के लिए। मेरे पैरेंट्स आजाद खयालों के थे इसलिए उन्होंने कह दिया था कि मैं जिसे चाहे पसंद करके शादी कर लूँ।
कभी-कभी मैं सोचती कि क्या वो भी मुझे चाहता होगा? अगर हाँ तो फिर वो कभी मुझसे मिला क्यों नहीं। धीरे-धीरे छह महीने गुजर गए उस मुलाकात को। फिर अचानक ही वो मिला तो मुझे दिया तले अंधेरा वाली बात याद आई। एक दिन मैं हॉस्पिटल के लिए निकली तो अचानक मुझे एक जाना-पहचाना चेहरा हॉस्पिटल के सामने के बगीचे में काम करता हुआ दिखा। “Doctor Patient Hospital Sex”
“सुनो माली।” उसके घूमते ही मैं धक्क से रह गई, “तुम?” सामने गौरव खड़ा था। मेरा प्यार, मेरा चैन। मैं एकटक उसे देख रही थी। “मैडम” गौरव ने मुझे सोते से जगाया। “मैं यहाँ माली का काम करता हूँ। आप अपने आप को संभालिए नहीं तो कोई भी आदमी इसका गलत मतलब निकाल सकता है।”
मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। “तुम मुझे आज शाम छह बजे मेरे घर पर मिलना। बहुत ज़रूरी काम है। आओगे ना? तुम्हें मेरी कसम।” कहकर मैं अपने आप को संभालती हुई तेजी से हॉस्पिटल में चली गई। मुझे मालूम था कि अगर मैंने मुड़कर देख लिया तो मैं अपनी रुलाई नहीं रोक सकूँगी।
हॉस्पिटल में मन नहीं लगा तो तबीयत खराब का बहाना बनाकर मैं भाग निकली। आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था। शाम को गौरव आने वाला था मुझसे मिलने। उसकी तैयारी भी करनी थी। वापसी में मुझे गौरव नहीं दिखा। मैं बाजार जाकर कुछ सामान खरीद लाई। सामान में एक झीना रेशमी गाउन, खाने-पीने का सामान और एक बोतल बीयर थी। एक लड़की के लिए बीयर खरीदना कितना मुश्किल काम है आज मुझे पता लगा था।
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बड़ी मुश्किल से किसी को पैसे देकर मैंने एक बोतल बीयर मँगवाई। आज मैं उसकी पूरी तरह से स्वागत करना चाहती थी। शाम चार बजे से ही मैं अपने महबूब के लिए तैयार होकर बैठ गई। हल्का मेकअप करके परफ्यूम लगाया। फिर ट्रांसपेरेंट ब्रा और पैंटी के ऊपर नया रेशमी गाउन पहन लिया। गुलाबी झीने गाउन को पहनना और नहीं पहनना बराबर था। बाहर से एक-एक रोयाँ दिख रहा था।
बिस्तर पर सफेद रेशमी चादर बिछा दी। रूम स्प्रे चारों ओर स्प्रे कर दिया। कुछ रजनीगंधा के स्टिक्स एक फूलदान में बेड के सिरहाने पर रख दिए। छह बजे तक तो मैं बेताब हो उठी। बार-बार घड़ी को देखती हुई चहलकदमी कर रही थी। 6:10 पर डोर बेल बजा। मैं दौड़कर दरवाजे पर गई।
पीप होल से देखकर ही दरवाजा खोलना चाहती थी। क्योंकि कोई और हुआ तो मुझे इस रूप में देखकर पता नहीं क्या सोचे। उसे देखकर मैंने दरवाजा खोला और उसे अंदर खींच लिया। दरवाजा बंद करके मैं उससे बुरी तरह से लिपट गई। किस करके पूरा मुँह भर दिया। “Doctor Patient Hospital Sex”
“कहाँ चले गए थे? मेरी एक बार भी याद नहीं आई?”
“मैं यहीं था मगर मैं जान-बूझकर ही आपसे मिलना नहीं चाहता था। कहाँ आप और कहाँ मैं। चाँद और सियार की जोड़ी अच्छी नहीं लगती।” मैंने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।
“खबरदार जो मुझसे दूर जाने का भी सोचा। अगर जाना ही था तो आए क्यों? मेरी ज़िंदगी में हलचल पैदा करके भागने की सोच रहे थे।” मैंने कहा।
“और मुझे ये आप-आप करना छोड़ो। तुम्हारे मुँह से तुम और तू अच्छा लगेगा।”
“लेकिन मेरी बात तो सुनिए……”
“बैठ जाओ।” कहकर मैंने उसे धक्का देकर सोफे पर बिठा दिया। मैंने मन ही मन डिसाइड कर लिया था कि इतना सब होने के बाद अब मैं गौरव से कोई शर्म नहीं करूँगी और निर्लज्ज होकर अपनी बात मनवा लूँगी। मैं उठी और फ्रिज से बीयर की बोतल निकालकर उसका कॉर्क खोला। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
एक काँच के ग्लास में उड़ेलकर उसके पास आई। ग्लास में उफनता हुआ झाग मेरे जज्बातों का उदाहरण पेश कर रहा था। मैं उससे सटकर बैठ गई और ग्लास को उसके होंठों से लगा दिया। उसने मेरी ओर देखते हुए मेरे हाथों से एक घूँट पिया। ग्लास को उसके हाथों में पकड़कर मैं खड़ी हो गई।
“तुम्हें मेरे ये बहुत अच्छे लगते थे ना?” मैंने अपने ब्रेस्ट्स की तरफ इशारा किया। उसके होंठों के बिल्कुल पास आकर पूछा।
“खोलकर नहीं देखना चाहोगे?” इससे पहले कि वो कुछ कहे मैंने खड़े होकर एक झटके में अपने गाउन को शरीर से अलग कर दिया। वो एकटक मेरी छातियों की ओर देख रहा था।
मैं उसके पास आकर दोनों पैरों को फैलाकर उसकी गोद में बैठ गई। उसके सिर को पकड़कर अपनी एक छाती पर दबा दिया। “ब्रा खोल दो।” मैंने उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा। मगर उसे कोई हरकत करता नहीं देखकर मैंने खुद ही ब्रा को शरीर से अलग कर दिया। आज मैं इतनी उत्तेजित थी कि ज़रूरत पड़ने से गौरव को रेप भी करने को तैयार थी।
“देखो ये कितने बेताब हैं तुम्हारे होंठों के।” कहकर मैंने उसके होंठों से अपने निप्पल सटा दिए। पहले वो थोड़ा झिझका फिर धीरे से उसके होंठ खुले और मेरा एक निप्पल मुँह में प्रवेश कर गया। वो अपने जीभ से निप्पल के टिप को गुदगुदाने लगा।
“आह हाँ प्लीज।” मैं उसके बालों में हाथ फिराते हुए बुदबुदाने लगी। उसके दूसरे हाथ को अपनी दूसरी ब्रेस्ट पर रखकर दबाने लगी। कुछ देर बाद उसने दूसरे निप्पल को चूसना शुरू कर दिया। उसके हाथ मेरे बदन पर घूम रहे थे। स्पर्श इतना हल्का था मानो शरीर पर कोई रूई फेर रहा हो।
कुछ देर बाद उसने मुँह उठाते हुए कहा, “मैडम अब भी संभल जाइए, अब भी वक्त है। हममें और आपमें ज़मीन-आसमान का फ़र्क है।”
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मैं एक झटके से उठी। अपने शरीर से आखिरी वस्त्र भी नोच डाला। “देखो इस शरीर की एक झलक पाने के लिए कई लोग बेचैन रहते हैं और आज मैं खुद तुम्हारे सामने बेशर्म होकर नंगी खड़ी हूँ और तुम मुझसे दूर भाग रहे हो।” मैंने उसके हाथ पकड़कर उठा दिया और लगभग खींचते हुए बेडरूम में ले गई।
उसे बेड के पास खड़ा करके मैं उसके कपड़ों पर टूट पड़ी। कुछ ही देर में वो भी मेरी ही हालत में आ गया। मैंने उसे बिस्तर पर पटककर उस पर चढ़ बैठी। उसके शरीर के एक-एक अंग को चूमने-चाटने लगी। उसके निप्पल्स को दाँतों से हल्के से काट दिया। उसके होंठों से अपने होंठ रगड़ते हुए अपना जीभ उसके मुँह में दे दिया। वो भी मेरी जीभ को चूसने लगा।
मेरे हाथ उसके लिंग पर फिर रहे थे। मैंने अब अपना ध्यान उसके लिंग पर कर दिया। पहले उसके लिंग को चूमा फिर उसे मुँह में लेकर चूसने लगी। लिंग का साइज़ बढ़कर लंबा और मोटा हो गया। उसका साइज़ देखकर एक बार तो मैं सिहर गई थी कि ये दानव तो मेरी चूत को फाड़कर रख देगा। “Doctor Patient Hospital Sex”
“बहुत ही शैतान है ये। इसने मुझे ऐसा रोग लगाया कि अब ये मेरा नशा बन गया है।”
काफी देर तक हम दोनों एक दूसरे के बदन से खेलते रहे। फिर मैं उसकी तरफ देखकर बोली, “आज मैं अपना कौमार्य तुम्हें भेंट कर रही हूँ। इससे महँगी कोई चीज मेरे पास नहीं है। प्लीज मुझे लड़की से आज औरत बना दो।” मैंने उसे चित लिटाकर उसका खड़ा लंड अपने चूत के मुहाने पर रखकर ज़ोर लगाई मगर अनाड़ी होने के कारण एवं मेरी चूत का साइज़ छोटा होने के कारण लिंग अंदर नहीं जा पाया।
मैंने फिर अपनी कमर उठाकर उसके लिंग को अपने हाथों से सेट किया और शरीर को ज़ोर से नीचे किया मगर फिर उसका लिंग फिसल गया। मैंने झुंझलाकर उसकी ओर देखा। “कैसे आदमी हो, तब से मैं कोशिश कर रही हूँ और तुम चुपचाप पड़े हुए हो। क्या हो गया है तुम्हें।” अब आखिर उसने अपनी झिझक को खत्म करके मुझे बिस्तर पर पटक दिया। मेरी टाँगों को चौड़ा करके मेरी चूत को चूम लिया।
“ये हुआ ना मेरा शेर! मसल दो मुझे। मेरी सारी गर्मी निकाल दो।” काफी देर तक मेरी गीली चूत पर जीभ फिराने के बाद वो उठा। मैं तो उसके जीभ से ही एक बार झड़ गई। उसने मेरी टाँगों को उठाकर अपने कंधे पर रखा और अपने लिंग को मेरी टपकती चूत पर रखकर एक ज़ोरदार धक्का मारा। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
“आह ऊई माँ” उसका लिंग रास्ता बनाता हुआ आगे बढ़कर मेरे कौमार्य की झिल्ली पर जा रुका। अब उसने एक और ज़ोरदार धक्का मारा तो पूरा लंड मेरे अंदर फाड़ता हुआ समा गया। “ऊफ मार ही दोगे क्या? ऊई माँ मर गई।” मैं बुरी तरह तड़पने लगी। वो लंड को पूरा अंदर डालकर कुछ देर रुका। धीरे-धीरे मेरा दर्द गायब हो गया।
उसने लंड को थोड़ा बाहर निकालकर वापस अंदर डाल दिया। फिर तो उसने खूब ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाए। मैं भी पूरी ज़ोर से नीचे से उसका साथ दे रही थी। अंदर-बाहर अंदर-बाहर जबरदस्त धक्के लग रहे थे। 45 मिनट के बाद वो मेरे अंदर ढेर सारा वीर्य उड़ेल दिया। “Doctor Patient Hospital Sex”
मैं तो तब तक तीन बार निकाल चुकी थी। वो थककर मेरे शरीर पर लेट गया। मैं तो उसकी मर्दानगी की कायल हो चुकी थी। वो बगल में लेट गया। मैं उसे हालत में उसके सीने के ऊपर अपना सिर रखकर उसके सीने के बालों से खेलने लगी। वो मेरे बालों से खेल रहा था।
“थैंक यू” मैंने कहा। “मैं आज बहुत खुश हूँ। मुझे चोदने वाला एक ज़बरदस्त लिंग है। जिसके धक्के खाकर तो मेरी हालत पतली हो गई। मगर खुश मत होना, आज सारी रात तुम्हारी बराबरी करूँगी।”
वो मुस्कुरा रहा था। मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा, “अब बोलो मुझसे प्यार करते हो? देखो ये चादर हम दोनों के मिलन की गवाह है।” मैंने चादर पर लगे खून के धब्बों की ओर इशारा किया।
उसने सिर हिलाया। “मुझसे शादी करोगे? धत्त मैं भी कैसी पगली हूँ। आज तक मैंने तो तुमसे पूछा भी नहीं कि तुम शादीशुदा हो कि नहीं और अपना सब कुछ तुम्हें दे दिया।”
“अगर मैं कहूँ कि मैं शादीशुदा हूँ तो?” उसने अपने होंठों पर एक कुटिल मुस्कान लाते हुए पूछा।
“तो क्या मेरी किस्मत। अब तो तुम ही मेरे सब कुछ हो। चाहे जिस रूप में मुझे स्वीकार करो।” मेरी आँखें नम हो गई।
“जब सब सोच ही लिया तो फिर तुम जब चाहे फेरों का बंदोबस्त कर लो। मैं अपने घर भी खबर कर देता हूँ।” उसने कहा।
“येस!” मैंने अपने दोनों हाथ हवा में ऊँचे कर दिए फिर उस पर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी। इस बार वो भी मुझे अपने ऊपर खींच लिया। एक और मैराथन राउंड चला। इस बार मैं उस पर चढ़कर उसके लिंग पर चढ़ाई कर रही थी। अब शर्म किसलिए, ये तो अब मेरा होने वाला शौहर था। “Doctor Patient Hospital Sex”
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काफी देर तक करने के बाद उसने मुझे चौपाया बनाकर पीछे से अपना लिंग डालकर धक्के मारने लगा। मेरी नजर सिरहाने की तरफ ड्रेसिंग टेबल पर लगे मिरर पर गई। बड़ी शानदार जोड़ी लग रही थी। वो पीछे से धक्के लगा रहा था और मेरे बड़े-बड़े उरोज आगे-पीछे उछाल रहे थे। मैं पोजीशन चेंज करके मिरर के समानांतर आ गई।
उसका मोटा काला लिंग मेरी चूत में जाता हुआ काफी एक्साइटिंग लग रहा था। मैं एक के बाद एक कई बार लगातार अपना पानी छोड़ दी। उसके बाद भी वो काफी देर तक करता रहा। फिर उसने ढेर सारा वीर्य मेरी योनि में डाल दिया। उसका वीर्य मेरी योनि से उफनकर बिस्तर पर गिर रहा था। वो थककर मेरे ऊपर गिर पड़ा। हम दोनों पसीने से लथपथ हो रहे थे। कुछ देर तक एक दूसरे को चूमते हुए लेटे रहे।
“तुम खुश तो हो ना?” मैंने उससे पूछा।
“तुम सा साथी पाकर कौन नहीं खुश होगा।”
गौरव ने कहा। “हर बच्चा परी के सपने देखता है मगर मुझे तो साक्षात परी मिल गई।”
फिर हम दोनों साथ-साथ नहाए। तैयार होकर मैं खाना बनाकर उसे अपने हाथों से खिलाई। और उसने मुझे खिलाया। फिर वापस हम बेडरूम में आ गए। रात भर राउंड पर राउंड चलते रहे। सुबह तक मेरा तो उसने बुरा हाल कर दिया था। ऐसा लग रहा था मानो मुझे मथनी में डालकर मथ दिया हो। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
चूत का हाल तो बहुत ही बुरा था। पहले ही मिलन में इतनी घिसाई तो उसके हिम्मत तोड़ने के लिए काफी थी। लाल होकर फूल गई थी। फोड़े की तरह दुख रहा था। सुबह तक तो मुझमें उठकर खड़े होने की ताकत भी नहीं बची थी। सुबह 6 बजे वो उठा और तैयार होकर निकल गया। जाने से पहले मुझे होंठों पर एक चुम्बन देकर उठाया।
“मत जाओ अब मुझे छोड़कर।” मैंने उससे विनती की।
“पागल लड़की है।” उसने कहा। “पहले शादी हो जाने दे फिर बाँध लेना मुझे।”
“सहारा देकर उठा तो सकते हो।”
उसने मुझे सहारा देकर उठाया। उसके जाने के बाद मैं सोफे पर ढेर हो गई। सुबह मुझसे मिलने मेरी एकमात्र सहेली अंकिता आई। “क्या हुआ मेरी बन्नो?” मैंने अपना हाल सुनाया तो वो भी खुश हुई। महीने भर बाद हम दोनों ने एक सादे समारोह में मंदिर में जाकर शादी कर ली। “Doctor Patient Hospital Sex”
मेरे घर वालों ने समझाने की कोशिश की मगर मेरा निश्चय देखकर शांत हो गए। मैंने ट्रांसफर के लिए अप्लाई किया जो कि जल्दी ही आ गया। नई जगह जॉइन करने के बाद मैंने शादी का अनाउंसमेंट किया। तब तक मैं पहले ही 3 महीने प्रेग्नेंट थी। अंकिता ने भी मेरे साथ ही सेम जगह ट्रांसफर के लिए अप्लाई किया जो कि मंजूर हो गया। गौरव ने एक छोटी-मोटी सी नर्सरी खोल ली।
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